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आपातकाल – मेरे जीवन का स्वर्णिम काल

Indu Sarkar by Madhur Bhandarkar, The Emergency

इंदु सरकार की पूरी टीम को बधाई। मधुर भंडारकर जी द्वारा बड़े परदे के माध्यम से, आज़ाद भारत के सबसे काले दौर को आज की पीढ़ी तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास किया है।

 

किन्तु “इंदु सरकार” तो मात्र एक झलक है आपातकाल की, कई कारणों से निर्माताओं के लिए पूरा सच दिखाना संभव भी नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना श्रेष्ठ दिया है।

 

पर गणतंत्र भारत के इस काले दौर को जिन्होंने अनुभव किया, वो ही उसे पूरी तरह समझ सकते हैं, मीसा बंदी के दिनों को मैंने अनेक जेलों में रहकर जिया है, और उन भयावह दिनों के एहसास को बयान कर पाना बहुत मुश्किल है, हालांकि यही दौर मेरे जीवन का स्वर्णिम काल भी रहा, वो कैसे, आइए बताता हूँ…  

 

25 जून 75 की रात पुलिस ने मीटिंग के बहाने बुलाकर 26 जून की सुबह जबलपुर जेल पहुँचा दिया। जबलपुर जेल की विभिन्न बैरेकों से होते हुये टीकमगढ़ जेल (बुंदेलखंड), वापस जबलपुर जेल और अततं: 29 जनवरी 77 को रिहाई के साथ 19 माह 04 दिन की जेल यात्रा का समापन हुआ। 23 वर्ष की उम्र में मिला यह अनुभव, लोकतंत्र के इस काले अध्याय के तमाम कष्टों और यातनाओं के बावजूद  मेरे जीवन का यह स्वर्णिम काल था।

 

कॉलेज जीवन समाप्त नहीं हुआ था। स्नातक की डिग्री हाथ नहीं लगी थी। प्रदेश के एकमात्र कृषि विधयालय का छात्र नेता और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की पृष्ठभूमि में जेलयात्रा प्रारम्भ हो गयी। शुरूआती कुछ दिन लडकोही में गुज़रे। उत्पाती लड़कों के समूह में हम पांच लोगोंं के समूह-को सेनिग्रेशन वार्ड (अब सुभाष चन्द्र बोस वार्ड) से निकाल पांच नं. बैरेक में भेज दिया। मात्र 36 दिनों बाद, 1 अगस्त 75 को हम 8 लोगोंं को टीकमगढ़ जेल (बुंदेलखंड भेज) दिया गया।

 

यहां से मेरा स्वर्णिम काल  प्रारम्भ हुआ। 8 लोगोंं में जनसंघ के कद्दावर नेता श्री बाबुराम पराजम्पे (बाद में सांसद), एडवोकेट श्री निर्मल जैन (बाद में म.प्र. उच्च न्यायलय के महाधिवक्ता, सांसद, राजस्थान के राज्यपाल) शामिल थे। मैं सबसे छोटा था। जनसंघ का इतिहास पर राजनीति का पाठ पढ़ने मुझे किताब की जरुरत नहीं पड़ीचलता फिरता ज्वलंत इतिहास 24 घंटो मेरे साथ था।

 

टीकमगढ़  जेल में हम 8 मिसा बंदियों को मिलने वाली सीमित सुविधाओं में जीवन कष्टप्रद को गया।  न सुबह की चाय का ठिकाना और न ही भरपेट भोजन के व्यवस्था। हमारा संख्या बल सीमित था।

 

दोनों नेताओं की मूक सहमति से जेल के बंदियों को अपने साथ मिलाया। 15 अगस्त 75 बंदियों से जेलर का घेराव करा दिया और 3 घंटो के बाद, जेलर को बंदियों के घेराव से मुक्त करा दिया, जेलर से कैदियों की मांगे पूरी करवा दी और जेलर को एवं जेल प्रशासन को अपनी मुटठी में कर लिया। जेल से सभी सुविधाओं हम मिसा बंदियों को मिलने लगी और जेल के खर्चे पर हम हर सप्ताह 100/- रू. की अपनी आवश्यकता की सामग्री बाजार से बुलवाने लगे। तत्कालीन उप जेलर श्रीवास्तव जो ग्वालियर जेल की अधीक्षक होकर सेवानिवृत्त हो चुके है और ग्वालियर में निवास कार रहे है इस घटनाक्रम के गवाह है।

 

मेरी अंग्रेजी कमज़ोर थी और एडवोकेट निर्मलचंद जैन अंग्रेजी के प्रकांड विद्वान थे। टीकमगढ़ जिले के पुलिस अधीक्षक श्री आर्या के पास अंग्रेजी पुस्तक का भंडार था। गुरु और शिष्य दोनों मिल गये। समय ही समय था। आज मै, जो कुछ अंग्रेजी जनता हूँ इसी स्वर्णिम काल की देन है। बाद में जब मैं, वापस जबलपुर जेल आया तो सेग्रिग्रेशन वार्ड के 100 मीसाबंदी साथियों को अंग्रेजी में लिखे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े राजनैतिक पृष्ठभूमि की किताबों का अध्ययन कर हिन्दी में भाषण देने लगा। नित्य 1 घंटे की क्लास लगने लगी। इस प्रकार इतिहास को जानना, पढना और बोलना सिखा। सेग्रिग्रेशन वार्ड में संघ के प्रचारक डॉ. देशमुख जी से मुलाकात हुयी। डॉ जी से हम लोग न्यू युद्ध सीखने लगे।

 

ज्यादा दिन जबलपुर जेल में नही रुका पाया। मेरे पहुँचने के बाद मुझे मीसाबंदियो की दैनन्दिनी गतिविधियों का सूत्रधार और मुख्य केंद्र मान कर, पहले मुझे अलग करके कोढ़ी बैरक में स्थानांतरित किया गया और 9 दिन बाद जावरा जेल (रतलाम, मध्यभारत) स्थानांतरित कर दिया। इस यात्रा में स्व. श्री विशाल पचौरी जी मेरे साथ थे जो मेरे मित्र बन गये। युवामोर्चा और राजनीति में म्रत्युपरंत तक मेरे साथ रहे। बाद में जबलपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बने और जबलपुर को वर्तमान आधुनिक विजयनगर का तोहफा दिया।

 

जावरा जेल में मै, ताले में नही रहता था। स्वतंत्र घूमता था। जावरा जेल में श्री चंद जी मित्तल (अब स्वर्गीय भूतपूर्व नगर निगम महापौर इंदौर नगर निगम) एडवोकेट चितले, विष्णु शुक्ला उर्फ़ बड़े भैया का सानिध्य मिला। तीन माह बाद फिर जबलपुर जेल आ गया। अब की बार, अलग बैरेक में सिवनी, छिंदवाडा, नरसिंहपुर के मीसाबंदियो के साथ। यहाँ हम लोगोंं ने अंतर बैरिक मीसा बंदी वॉलीबाल, कैरम, शतरंज जैसी प्रतियोगिता शुरू कार दी। व्यथित लोगोंं को व्यस्त रखने ‘’ हरे राम हरे, हरे कृष्णा ‘’ का 21 दिनों अखंड कीर्तन करवा दिया।

 

प्रत्येक जेल में जाकर, जेल के बहार तक पता और सम्पर्क सूत्र स्थापित करना ताकि अन्य जेल में मीसाबंदियो से और जेल के बाहर आंदोलन चला रहे नेताओं से (जेल प्रशासन की नजर बचाकर) सम्पर्क बनाये रखा जांये। ये सब मेरी जवाबदारी थी।

 

जेल से बाहर आते ही लोकसभा चुनाव की जबावदरियां मिली। जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह पर विधानसभा  चुनाव लड़ा। पार्टी के अंदर घात-प्रतिघात देखा। तीर-कमान चलते देखा। युवा मोर्चा के गठन में भूमिका निभाई।

 

युवा मोर्चा को युवा जनता और जनता युवा मोर्चा में टूटते देखा। जनता पार्टी को टूटते देखा। भाजपा को बनते देखा। राजनीति के मैदान में नेताओं के आशीर्वाद से अनेक जबावदारियो के निवर्हन का मोका मिला। अनेको संस्मरण और यादें है यहाँ अंत में बस एक चित्र का उल्लेख – जहाँ माननीय कुशाभाऊ ठाकरे और मैं दीप प्रज्ज्वलन कर रहे हे और माननीय नरेंद्र मोदी जी साथ खड़े है। प्रारब्ध और परिश्रम से आज मोदी जी आगे आगे और बहुत आगे खड़े है। हम सबके प्रेरणा स्त्रोत बनकर। देश की उम्मीदों के दीप स्तम्भ बन कर।