जब अटल जी और मैने पूरी रात बैठे – बैठे गुजारी

भारतीय राजनीति के अटल अध्याय का अंत हो चुका है। अपने ओजस्वी भाषण के लिए हमेशा याद रखे जाने वाले श्री अटल बिहारी जी वाजपेयी का गुरुवार को निधन हो गया।

भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल जी का संपूर्ण व्यक्तित्व शिखरपुरुष के रूप में दर्ज है। उनकी पहचान एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक,भाषाविद, कवि, पत्रकार व लेखक के रूप में है। भारतीय जनता पार्टी का हर कार्यकर्ता उनसे आत्मीयता के साथ जुडा था। उनके साथ बिताये अनेक संस्मरण याद आ रहे है।

आज आपके साथ एक घटना का जिक्र करना चाहूँगा। जब अटल जी और मैने पूरी रात बैठे – बैठे गुजारी थी। 

बात तकरीबन 25 साल पुरानी है, तब अटल जी की जबलपुर में सभा थी। हुआ कुछ यूँ,  जबलपुर एअरपोर्ट से कार में अटलजी के साथ आना था, तब रास्ते में अटलजी ने कहा, कि आज पूर्णिमा है और भेड़ाघाट का नज़ारा निखर कर दिखेगा। मुझे पूर्णिमा की जानकारी नहीं थी, पता करके उनसे चलने का आग्रह किया पर कहीं भोपाल वाली ट्रेन छूट न जाए ये सोचकर उन्होंने मना कर दिया, पर इस ट्रेन का भेडाघाट स्टेशन पर स्टॉपेज न होते हुए भी अटलजी को आश्वस्त कर लिया कि ट्रेन 2-3 घंटे लेट आएगी हम चल सकते है अटलजी के कवि मन ने पूर्णिमा के चाँद की चाँदनी से नहाये भेड़ाघाट के अद्भुत नज़ारे का दर्शन कर हमारी तारीफ़ की।

 

पर मुसीबत उसके बाद शुरू हुई क्योंकि भेडाघाट स्टेशन पर ट्रेन का स्टॉपेज तो था नहीं, साथ ही देर होने के डर से ओढ़ने का सामान भी नहीं लिया था तब ट्रेन में AC के डब्बे नही होते थे। मुझे अटल जी को साथ लेकर जबलपुर से भोपाल जाना था। प्रथम श्रेणी के डब्बे में एक 2 सीट वाला कूपे बुक था, ऊपर से दिसंबर की ठंड की रात थी।

 

हम नए नए होशियार बने थे। हमें मालूम था कि प्रथम श्रेणी के यात्री को मांगने पर स्टेशन मास्टर द्वारा बिस्तर उपलब्ध कराये जाते है। सो,हमने स्टेशन मास्टर को बोल दिया। जब ट्रेन चली तो अटल जी नीचे वाली और मैं ऊपर वाली सीट पर लेट गए। बिस्तर के नाम पर एक चादर और ओढ़ने को शालनुमा एक लाल कम्बल था। बन्द खिड़की की दरारों से ठंडी हवा बिना रोक टोक के अंदर आ रही थी। ठंड बर्दाश्त  के बाहर थी, लेटना संभव नही हुआ तो मैं शाल ओढ़ कर बैठ गया। नीचे की ओर देखा तो, अटल जी भी शाल लपेटे हुये बैठे है। लचर व्यवस्था के लिए खूब डांट पड़ी, परंतु भोपाल तक का सफर बैठे-बैठे ही पूरा हुआ। उसके बाद कई साल तक जब भी अटलजी सामने पड़ते थे तो उस रात को याद करते थे।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

हंसते गाते खिलखिलाते अटलजी अब शांत लेटे है। विश्वास नही होता। मन बेचैन है, दिल भारी है, आंखों में आँसू है। उस महान व्यक्तित्व को शब्दों में नही बांध पाऊंगा।

 

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