हम सब में है महाभारत

“महाभारत, हम सब में है बस उसे पहचानने की देरी है। हमारी पाँच इंद्रियाँ पाँच पांडवों की तरह हैं

और सौ बुराइयाँ उन सौ कौरवों की तरह हैं जो हमेशा दूसरों का अहित चाहते हैं और हैं दिशा हीन। हमारा कर्ण (कान) है तो पांडवों का भाई, पर झुकता कौरवों की ओर है।

अर्थात जिसका झुकाव बुराईयों की ओर है। हमारी आत्मा “श्री कृष्ण” है, जो हमेशा सत्य और अटल है। इन सब से तात्पर्य यह है कि, हमें हमेशा “श्री कृष्ण” रुपी आत्मा के सन्देश, उसकी आवाज़ को सुनना चाहिए।

एक “श्री कृष्ण” रुपी आत्मा ही है, जो हमें दुष्कर्म करने और बुरे के मार्ग पर चलने से बचा सकती है।”

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